लेखक: आकाश छेत्री मैं अपनी माँ के ज्यादा करीब हूँ ऐसा कहना गलत नहीं होगा और पिताजी....., पिताजी के साथ हमेशा से एक अदृश्य फाँसला रहा है शायद ज्यादातर लड़को का अपने पिता के करीब होना हमेशा से मुश्किल रहा है। एक घर में होते हुए भी हम दोनों ज्यादा बात नहीं करते और कभी हो भी जाये तो वो औपचारिक सी सुनाई देती है। पिताजी और मेरे बीच हमेशा से एक दायरा रहा है, एक दीवार रही है जिसमें एक छोटी खिड़की है जहाँ से हम एक दूसरे को देखते है, नहीं वो शायद खिड़की नहीं बल्कि वो हमारा एक दूसरे को देखने का नज़रिया है जो बहुत संकुचित है जहाँ से न मैं कभी उनका पूरा हिस्सा देख पाया हूँ और न वो मेरे उनको लेकर भाव को देख पाए हैं। हम दोनों एक दूसरे की फ़िक्र करते हैं, एक दूसरे के एकदम पास है परंतु एक दूसरे के स्पर्श से वंचित हैं। माँ को गले लगाना सामान्य सी बात है लेकिन पिताजी को आख़िरी बार गले कब लगाया था उसका स्मरण न ही मेरे जहन में है और न ही उनके आलिंगन के अवशेष मेरे शरीर पर मौजूद है। कितना मुश्किल होता है हम लड़को को अपने पिता से कहना कि हमें उनसे प्रेम है और हमें उनपर गर्व है। मैं पिताजी को रोज़ देखता हूँ कामों में ...
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