कुछ मन की बातें

मैं आजकल जल्दबाज़ी में कुछ भी नही करता हूँ। एक समय था जब हर समय हड़बड़ी मची रहती थी फिर चाहे कैरियर में हो, सफर में हो या फिर प्रेम पाने में हो। मुझे हमेशा से हर चीज़ जल्दी चाहिए थी। मैं हर चीज़ को समझने के बजाय उसे पाने के लिए भागता रहता था। जिन लोगों को मैं हमेशा रेलगाडी की रफ़्तार से अपने जीवन में आगे बढ़ते देखता था तो मुझे भी उसी रफ्तार को पाने की तीव्र इच्छा होती। परन्तु कई सालों तक अंधाधुंध भागने के बाद अब मैं ठहर गया हूँ। मुझे अब इस रेस मैं किसी से आगे नही जाना है और न ही अब मुझे इस रेस का हिस्सा होना है। अब मैं किसी किताब को जल्दी खत्म करने की कोशिश में नही रहता बल्कि अब मैं बहुत धीरे धीरे उसके अंत तक पहुँचता हूँ।

मुझे अब समझ मे आया है कि रेलगाडी की रफ़्तार भले ही लुभावने वाली हो, भले ही वो आपके अंदर adrenaline rush पैदा कर दे मगर जिस प्रकार तेज़ रफ्तार रेलगाडी से बाहर देखने पर सब कुछ धुंधला दिखता है ठीक उसी प्रकार जल्दबाजी में कई खूबसूरत चीज़े धुंधली होकर पीछे छूट जाती हैं। मुझे अब कुछ भी जल्दी नही बनना है न डॉक्टर, न वकील और न ही लेखक। मुझे अब कहीं भी जल्दी पहुँचने का शौक नही है, मैं अपनी गति और समय से वहाँ पहुँचना चाहता हूं जहां मुझे पहुँचने की इच्छा है फिर चाहे वो कोई शहर घूमना हो या बुढ़ापे की दहलीज़ पे पहुँचना हो। मुझे अब इंस्टेंट लव वाले ट्रेंड से भी बचना, मुझे प्रेम से उसके तय वक्त पे मिलना है। मुझे मालूम है कि इस फ़ास्ट पेस वाली लाइफ में हम सभी को सब कुछ जल्दी अर्जित कर लेना है मगर मैं अब हर चीज़ को बारीकी से जानना चाहता हूँ मैं अब इस ज़िन्दगी का हर लम्हां जीना चाहता हूँ।

बचपन में हम सबने कछुए और खरगोश वाली कहानी सुनी है। मुझे अब खरगोश नही बल्कि वो धीरे चलने वाला कछुआ बनना है।

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